ऐतिहासिक सरस्वती नदी के वजूद को तलाशने और उसे जिंदा करने की कवायद एक बार फिर शुरू होने जा रही है। पहले से ही नदी पर कई तरह के शोध हो रहे हैं अब हरियाणा सरकार ने इस नदी पर शोध के लिए ओ एन जी सी और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के स्युंकत उपक्रम को 10 करोड़ की ग्रांट दी है.. अगर नदी पर शोद्द कामयाब रहा और नदी की खोज सही मायने में हो पाई तो न केवल धार्मिक बल्कि आर्थिक तौर पर भी इसके फायदे होंगे..
सरस्वती नदी सदियों से आस्था और शोध की वजह बनी हुई हैं.. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ये नदी लगभग साढे 5 हजार साल पहले लुप्त हुई थी .. इससे पहले ये पुरे वेग से बहती थी.. इस नदी से कई हिन्दू मान्यताएं और कथाएं भी जुडी हुई हैं.. वर्तमान में ऐसा माना जाता है की यमुनानगर के पास आदिबद्री नमक स्थान मैदानी इलाकों के लिए सरस्वती नदी का उद्गम स्थल है। अभी भी यहां पहाड़ी से पानी टपकता रहता है। यह पानी एक कुंड में जमा होता है जहां श्रद्धालु इसका आचमन करते हैं। इसरो व अन्य वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि आदिबद्री ही सरस्वती नदी का मुहाना है। यहाँ रहकर पूजा अर्चना करने वाले महंत की माने तो वो दिन दूर नहीं जब ये नदी पुन धरती के ऊपर से बहाकर इंसान को तृप्त और भौतिक तौर पर मजबूत करेगी..
हरियाणा सरकार भी इस बात की मानती है की इस नदी को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए.. इसके लिए पहले सरकार ने योजना बनाकर दादुपुर नलवी नाहर का निर्माण करवाया था ताकि उसके माध्यम से नदी को पुनर्जीवित करने का काम सिरे चढ़ाया जा सके..हरियाणा सरकार ने सरस्वती नदी की लगभग 83 किलोमीटर लंबी धारा को पुनर्जीवित करने का निश्चय किया है। इसका विस्तार यमुनानगर जिले के ऊंचा चांदन गांव से लेकर कुरुक्षेत्र के नरकातारी गांव और बाद में पिहोवा तक करने की योजना है.सरकार चाहती है की जहां नदी का पुराना मार्ग उपस्थित है, वहां इसे पुनर्जीवित करने का काम किया जाए.. अब सरकार ने इस मसले पर ओ एन जी सी से अह्योगसहयोग माँगा है.. ओ एन जी सी और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय मिलकर नदी के पुनर्जीवन के लिए काम करेंगे.. सरकार ने इसके लिए १० करोड़ की ग्रांट भी जारी की है..
जिस तरह से हरियाणा में लगातार भूजल स्तर लगातार निचे जा रहा है उसे देखकर कहा जा सकता है की अगर सरकार की योजना सिरे चढ़ी और इस नदी को पुनर्जीवित किया जा सका तो निश्चित तौर पर हरियाणा के एक हिस्से की पानी की समस्या तो दूर हो ही जाएगी..
2 comments:
भारत में सिंधु सभ्यता (यानि हड़प्पा-मोहनजोदड़ो) के वक्त के जो अधिकतर शहर सामने आए है, वे सभी अब सूख चुकी सरस्वती नदी के तट पर ही बसे हुए थे। इन शहरों की खोज काफी बाद में हुई--अभी भी यहां काम चल रहा है--जिसके चलते इन शहरों की गिनती सिंधु सभ्यता के शहरों में कम ही दिखाई पड़ती है। क्योकि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे शहरों की खुदाई सबसे पहले हुई थी इसलिए सिंधु सभ्यता इन्हीं शहरों के नाम से भी प्रचलित है। लेकिन नई रिसर्च ये बताती है कि हाल ही में भारत में सिंधु सभ्यता के जो नए शहर-धौलीवीरा, कालीबंगा- सामने आए है वे ज्यादा संपन्न और समृद्ध थे।
sahi kaha neeraj bhaai.. lekin dikkat ye hai ki saraswati ab rajnitik mudda ban gya hai..
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