Tuesday, January 3, 2012

नहीं संभल रहा मनप्रीत से "कुनबा"


कहते हैं की कुनबा बढ़ाना मुश्किल नहीं होता उस कुनबे को जोड़े रखना मुश्किल होता है. यह बात पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री और पिपुल्ज़ पार्टी ऑफ़ पंजाब (पीपीपी) के अध्यक्ष मनप्रीत बादल से बेहतर कौन समझ सकता है. २३ मार्च २०११ को शहीद भगत सिंह के गाँव खटकड़ कलां में आयोजित एक विशाल रैली में भगत सिंह के गाँव की मिटटी को अपनी मुट्ठियों में भरकर मनप्रीत बादल का साथ और पंजाब की राजनीती को नई दिशा देने की कसमे खाने वाले ज्यादातर नेता मनप्रीत बादल का साथ छोड़ चुके हैं. इन नेताओं ने साबित किया है की नेता ना किसी के स्थाई दोस्त होते हैं ना दुश्मन. पी पी पी का साथ छोड़कर इन नेताओं ने या तो कोंग्रेस का हाथ थाम लिया या शिरोमणि अकाली दल की तराजू में बैठ गये. उनके साथ लम्बा सफ़र तय करने का दावा करने वाले ज्यादातर नेता मनप्रीत बादल और पी पी पी का साथ नौ महीने भी नहीं दे पाए. हालत ये हैं की अब मनप्रीत बादल के पास कार्यकर्ता तो हैं लेकिन नेता नहीं हैं. हाल ही में जिन दो बड़े चेहरों ने मनप्रीत को अकेला छोड़ा उनमे मनप्रीत के रिश्तेदार सबसे नजदीकी माने जाने वाले जालंधर (कैंट) से पूर्व विधायक जगबीर सिंह बराड़ और पूर्व विधायक कुशलदीप ढिल्लों शामिल हैं. माना जा रहा है की जैसे जैसे पंजाब के चुनाव नजदीक आयेंगे पतझड़ के मौसम जैसे पेड़ से पत्ते टूटकर अलग हो जाते हैं कुछ उसी तरह कई नेता पीपीपी से दूर हो जायेंगे.
पंजाब में नया राजनितिक इतिहास लिखने का सपना लगातार कई नेताओं और पार्टियों समय समय पर देखा. यह सपना देखने का ताजा उदाहरण हैं मनप्रीत सिंह बादल. राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भाई गुरदास बादल के बेटे मनप्रीत राज्य के पूर्व वित्त मंत्री हैं. सुलझे हुए राजनेता और मुद्दों की बात करने वाले मनप्रीत बादल ने भी पंजाब के लोगों को कोंग्रेस और शिरोमणि अकाली दल से अलग तीसरा राजनितिक विकल्प देने का सपना दिखाते हुए पीपीपी का गठन किया था. मनप्रीत ने जब शिरोमणि अकाली दल का साथ छोड़ा उस समय बहुत से नेता मनप्रीत के साथ हो लिए. तब माना जा रहा था की मनप्रीत बादल की आंधी आएगी तो उसके गुब्बार में शिरोमणि अकाली दल के नेता परेशान हो जायेंगे. आंधी तो आई लेकिन जब गुब्बार छंटा तो शिरोमणी अकाली दल की जगह खुद मनप्रीत बादल परेशान नजर आ रहे हैं. उनके साथ खड़े होने का दम भरने वाले नेता उन पर गंभीर आरोप लगाकर उनके किनारा कर रहे हैं और कोंग्रेस या अकाली दल में शामिल हो रहे हैं. जिन साथियों के दम पर पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने राजनीती में अलग राह चुनते हुए शिरोमणि अकाली दल और अपने ताया प्रकाश सिंह बादल से बागवत की थी, वो एक एक करके उनका साथ छोड़ रहे हैं. तमाम कोशिशों के बावजूद मनप्रीत बादल उन्हें अपने साथ नहीं रोक पा रहे. अपना कुनबा बढ़ाने की सोचने की बजाय अब यह बादल इस बात में लगे हैं की कैसे बचे खुचे कुनबे को संभाला जाए.
मनप्रीत बादल ने पीपीपी का गठन करने के पहले से ही अपने जैसी सोच रखने वाले नेताओं या सामाजिक लोगों को अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया था. उन्होंने लगातार खुद को ऐसे नेता के तौर पर पेश किया जिसे ऐशो आराम या सत्ता के नशे से ज्यादा आम लोगों की दिक्कतों से सरोकार है. इसी के चलते उन्होंने अपने एजेंडे में भी कई ऐसे मुद्दे रखे जिनका जनता से सीधा सरोकार है. मनप्रीत जहाँ भी गये काफी संख्या में लोगों ने उन्हें सुना. लेकिन इस देश में जब नेता बोलता है खासकर कोई पढ़ा लिखा और बढ़िया वक्ता, तो उसे सुनने के लिए लोग जमा हो ही जाते हैं, लेकिन बड़ी बात तब होती है जब ये लोग वोट भी उसी नेता या उसकी पार्टी को दें जिसके भाषण उन्हें पसंद आ रहे हों. मनप्रीत बादल के साथ यही हो रहा है लोगों उनकी नीतियों और बातों को पसन्द कर रहे हैं लेकिन पी पीपी से दूर हो रहे हैं. इसे सत्ता की लालसा कहें या फिर संघर्ष से बचने का तरीका की उनका साथ छोड़ने वाले नेता कोंग्रेस या अकाली दल में जाकर अपने लिए जगह बना रहे हैं. खास बात ये है की जब भी कोई नेता पीपीपी छोड़कर कोंग्रेस या शिरोमणि अकाली दल में शामिल होता है तो उसे ये दोनों पार्टियाँ ऐसे प्रचारित करती हैं जैसे उन्होंने बड़ा तीर मारा हो. इनकी ख़ुशी से कई बार तो जनता भी परेशान हो जाती है. जनता भी ये सोचने लगती है की आखिर मनप्रीत बादल से इन दोनों बड़ी पार्टियों को किस बात का डर है जो उने साथियों को तोड़कर ये जश्न मानाने लगती हैं. हालाँकि मनप्रीत का साथ छोड़कर अकाली दल में वापसी करने वालों को अपने आपको एडजेस्ट ज्यादा दिक्कत नहीं आती लेकिन जो नेता कोंग्रेस में आ रहे हैं उन्हें जरुर परेशानी हो सकती है. क्यूंकि पहले अकाली दल और बाद में पीपीपी में रहते हुए इन्होने कोंग्रेस और पार्टी के प्रधान अमरिंदर सिंह को दिन रात कोसा था. यही नहीं इनके कोंग्रेस में आने से पार्टी के उन नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें आने लगी हैं जिनके हलकों से ये नेता सम्बन्ध रखते हैं. हाल में कोंग्रेस में शामिल जगबीर सिंह बराड़ और कुशलदीप ढिल्लों को लेकर पार्टी में बगावत के सुर फूटने लगे हैं. कोंग्रेसियों को लगता है की इन नेताओं को टिकेट देने का वायदा किया जा रहा है हलाकि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कहते हैं की जो भी नेता कोंग्रेस में आ रहे हैं वो बिना किसी शर्त के आ रहे हैं. मनप्रीत के कई साथियों को तोड़ने के बाद अब शिरोमणि अकाली दल और कोंग्रेस की नज़र उनके साथ खड़े नेताओं और दुसरे सामाजिक लोगों पर है. ये दोनों दल इनपर भी डोरे ड़ाल रहे हैं और अगर इनमे से भी कुछ मनप्रीत बादल का साथ छोड़ देन तो किसी को हैरानी नहीं होगी.
किसी मशहूर शायर ने कहा है की "मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ मिलते गये और कारवां बनता गया". लेकिन आजकल जो हालत पी पीपी में चल रहे हैं उन्हें देखकर शायरी को बहुत पसंद करने वाले मनप्रीत बादल शायद सोच रहे होंगे की "मैं कारवां के साथ चला था मंजिल की और लेकिन लोग साथ छोड़ते गये और कारवां टूटता गया". पीपीपी का गठन होने के बाद पंजाब में इस पार्टी को लेकर काफी चर्चाएँ हो रही थी. यही नहीं मनप्रीत बादल ने जनता को कोंग्रेस और अकाली दल से अलग तीसरा फ्रंट देने के लिए अपनी सोच की कई पार्टियों को मिलकर साझा मोर्चा भी बनाया. उन्होंने खुद को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करते हुए कहा की ये मोर्चा जरुर सत्ता में आएगा. इस मोर्चे में वामपंथी दलों के अलावा अकाली दल (लोंगोवाल) भी शामिल है. अपने साथियों के छोड़ देने के बाद अब मनप्रीत बादल के लिए उनके साथी घटक दल भी मुसीबत बनते नज़र आ रहे हैं. सूत्रों का कहना है की अकाली दल ओंगोवल के अध्यक्ष सुरजीत बरनाला के बेटे गगनजीत बरनाला को ये लगने लगा है ये मोर्चा सत्ता के दरवाजे तक शायद ही पहुँच पाए. ऐसे में क्यूँ ना उस दल से हाथ मिला लिया जाए जिसके सत्ता में आने के चांस सबसे ज्यादा है. यही सोचकर बरनाला दिल्ली के चक्कर लगा रहे हैं. बताते हैं की वो कोंग्रेस का हाथ थामना चाहते हैं. मनप्रीत बादल को इस बात का इल्म है की अगर बरनाला भी साथ छोड़ गये तो विधानसभा चुनाव में बड़ी मुश्किल होगी. इसलिए वो उन्हें मनाने में जुटे हैं. जिन हालातों से मनप्रीत बादल गुज़र रहे हैं उनमे उन्हें एक गीत जरुर याद आ रहा होगा- कमसे वादे प्यार वफ़ा सब बाते हैं बातों का क्या, कोई किसी का नहीं है झूठे नाते हैं नातों का क्या?

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